"बिहार की राजनीति में “प्रयोग” क्यों असफल हुआ? जनता ने नीयत को तवज्जो दी, अभिनय को नहीं"
बिहार की राजनीति हमेशा देश के लिए एक संकेतक रही है यहाँ नेता सिर्फ़ भाषणों से नहीं, बल्कि अपने चरित्र, विश्वसनीयता और
ज़मीनी जुड़ाव से पहचाने जाते हैं। हाल के चुनावों ने इस सत्य को एक बार फिर प्रमाणित कर दिया।
पिछले दो वर्षों में बिहार की राजनीति में एक नया “आयातित प्रयोग” उतरा एक ऐसा नेता जो विकास मॉडल का दावा करता रहा, जिसने खुद को विकल्प के रूप में स्थापित करने की कोशिश की, लेकिन उसकी रणनीति कागज़ पर जितनी आकर्षक दिखती थी, जमीन पर उतनी ही खोखली साबित हुई।
यह प्रयोग कुछ लोगों को “नई राजनीति” का प्रतीक लग सकता था, लेकिन बिहार की जनता ने इसे तुरंत समझ लिया कि नीयत और अभिनय में फर्क होता है।
बड़े दावे, बड़े वादे… और बड़ी पराजय
इस नए राजनीतिक प्रयोग ने चुनाव से पहले दो तेज़ हमलावर घोषणाएँ कीं
“150 सीट से कम मिली तो राजनीति छोड़ दूँगा।”
“अगर जेडीयू 25 से ऊपर गई, तो सार्वजनिक जीवन से हट जाऊँगा।”
इन दावों के पीछे रणनीति थी कि जनता भावनात्मक रूप से प्रभावित होकर नए विकल्प को स्वीकार कर लेगी।
लेकिन बिहार की राजनीति भावनात्मक ड्रामों पर नहीं, नीयत पर चलती है।
और नतीजे?
238 सीटों पर लड़ाई, जीत शून्य।
233 सीटों पर जमानत ज़ब्त।
इतिहास में बहुत कम बार ऐसा देखने को मिलता है कि इतनी बड़ी दावेदारी इतनी बड़ी पराजय में बदल जाए। यह सिर्फ़ एक चुनावी हार नहीं, बल्कि जनता द्वारा दिया गया एक स्पष्ट संदेश था
“विश्वसनीयता से बड़ी कोई पूँजी नहीं होती।”
क्यों नहीं चला “बाहरी प्रयोग”?
इस सवाल का जवाब बिहार की राजनीति की खासियतों में छिपा है
1. बिहार अभिनय नहीं, विश्वसनीयता मांगता है
चुनाव प्रचार में पहनावा बदलने, प्रतीकों का उपयोग करने, या अपनी छवि को किसी खास समुदाय के मुताबिक ढालने से वोट नहीं मिलते। यहाँ मतदाता जानते हैं कि असली चेहरा कौन-सा है और मुखौटा कौन-सा।
2. लंबा राजनीतिक इतिहास और सामाजिक समझ
बिहार के मतदाता राजनीतिक रूप से परिपक्व हैं।
वे जानते हैं कि कौन नेता वर्षों से संघर्ष करता हुआ यहाँ की मिट्टी से जुड़ा है, और कौन सिर्फ़ “राजनीतिक इंजीनियरिंग” के सहारे नेतृत्व का दावा कर रहा है।
3. स्थायी उपस्थिति बनाम चुनावी प्रयोग
बिहार की राजनीति में जड़ों का होना ज़रूरी है।
यहाँ मंचों से दिए गए भाषणों या पॉलिटिकल कंसल्टेंसी के अनुभव से विश्वसनीयता नहीं बनती।
जनता जानती है कि जो नेता जनता के सुख-दुख में मौजूद नहीं होता, वह केवल चुनावी मौसम में अपना चेहरा दिखाने आता है।
4. पीके का “मॉडल” क्यों नहीं चला?
यह चुनाव इस बात का प्रमाण है कि कंसल्टेंट होने और जननेता होने में विशाल अंतर है।
रणनीति बनाना अलग बात है,
ज़मीन पर भरोसा खड़ा करना अलग।
बिहार का संदेश आप छवि बदल सकते हैं, लेकिन नीयत नहीं छिपा सकते
हालिया नतीजे इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं कि बिहार की जनता दिखावे की राजनीति के प्रति सबसे कम संवेदनशील है।
चाहे कोई टोपी पहन ले, scarf लपेट ले, या धार्मिक प्रतीक बदल ले बिहार की जनता नीयत को सूंघ लेती है।
ये नतीजे लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबसूरती को दर्शाते हैं
यहाँ जनता अंतिम फ़ैसला करती है, और उस फ़ैसले में भ्रम या भावनात्मक उकसावे की कोई जगह नहीं।
बिहार ने लोकतंत्र की गरिमा बचाई
इस चुनाव में बिहार ने पूरे देश को संदेश दिया है
जनता अभिनय नहीं, नीयत को वोट देती है।
जो नेता जनता से दूरी बनाए रहते हैं, वे चुनाव में धराशायी हो जाते हैं।
राजनीति सिर्फ़ रणनीति का खेल नहीं, बल्कि विश्वास और सेवा का विषय है।
बिहार के मतदाताओं को नमन, जिन्होंने दिखाया कि लोकतंत्र में असली ताकत जनता की राजनीतिक समझ और सजगता में निहित है।
बिहार ने फिर साबित किया
यहाँ राजनीति प्रयोग का मैदान नहीं, जनसेवा की कसौटी है।
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