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दिसंबर, 2025 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

जब भारत सहिष्णुता का राष्ट्र है, तो वक़्फ जैसी संस्थाओं की आवश्यकता क्या है?

 *जब भारत सहिष्णुता का राष्ट्र है, तो वक़्फ जैसी संस्थाओं की आवश्यकता क्या है?* भारत दुनिया का सबसे सहिष्णु, सबसे उदार और सबसे धार्मिक-सांस्कृतिक सद्भाव वाला राष्ट्र माना जाता है। लेकिन विडंबना यह है कि इसी सहिष्णु देश में कुछ संस्थाएँ ऐसी हैं जिन्हें विशेष शक्तियाँ, विशेष अधिकार और विशेष दर्जा देकर बाकी नागरिकों से ऊपर बैठा दिया गया है। सबसे बड़ा उदाहरण वक़्फ बोर्ड। वक़्फ बोर्ड: एक “सुपर पावर” जो संविधान से भी ऊपर?देश में कोई भी सरकारी विभाग, पुलिस, कलेक्टर, कोर्ट किसी संपत्ति को अपने नाम नहीं कर सकता बिना लंबी प्रक्रियाओं, जांचों और अनुमति के। लेकिन वक़्फ बोर्ड को सिर्फ “घोषणा” करना होती है कि फला जमीन वक़्फ की है और वह जमीन उनके नाम दर्ज हो जाती है।कोई जांच नहीं, कोई सुनवाई नहीं, कोई सीमांकन नहीं।कौन सा लोकतांत्रिक देश एक ही धर्म को यह “अलौकिक अधिकार” दे सकता है? भारत जैसा उदार राष्ट्र भी ऐसी संस्थाओं को अनुमति देता रहा यह सवाल खड़ा करता है। सहिष्णुता सबके लिए है, विशेषाधिकार किसी के लिए नहीं यदि भारत वाकई सहिष्णु राष्ट्र है तो सहिष्णुता बहुमत अल्पसंख्यक पर आधारित नहीं हो सकती।स...

आखिर धर्म आधारित विशेषाधिकार कब तक?

 धर्म आधारित विशेषाधिकार कब तक? UCC लागू करना ही देशहित में एकमात्र रास्ता भारत आज भी एक ऐसे दौर में खड़ा है जहाँ कानून एक है, लेकिन उसके लागू होने के तरीके कई हैं।सबके लिए संविधान एक है, लेकिन नागरिक अधिकार धर्म के आधार पर बदल जाते हैं।यह स्थिति न समाज के लिए ठीक है और न ही देश की एकता के लिए।आज सबसे बड़ी जरूरत है धर्म आधारित हर प्रकार की छूट और विशेषाधिकार को खत्म करने कीक्योंकि जब तक कानून समान नहीं होंगे,देश में समानता, एकता और न्याय सिर्फ कागज़ पर ही रह जाएगा।  अल्पसंख्यक आयोग क्यों हो जब देश का हर नागरिक बराबर है?यह कड़वी हकीकत है कि भारत में वोट बैंक की राजनीति ने धर्म को एक राजनीतिक हथियार बना दिया है।अल्पसंख्यक आयोग जैसे संस्थान आज धर्म विशेष के लिए बने हुए हैं,जबकि देश को चाहिए था समान अवसर आयोग सबके लिए।जब सबके अधिकार समान हैं तो फिर आयोग धर्म आधारित क्यों? जब एक गरीब हिंदू या गरीब मुस्लिम एक ही समस्याएँ झेल रहे हैं,तो समाधान अलग-अलग क्यों?इसलिए यह आयोग अपने वर्तमान स्वरूप में अब बेमानी है।धर्म के नाम पर छूट यह विशेषाधिकार नहीं, अन्याय हैदेश में कानून सबके लिए समान ...

इंदिरा गांधी की इमरजेंसी: लोकतंत्र पर पड़ा सबसे काला साया

इंदिरा गांधी की इमरजेंसी: लोकतंत्र पर पड़ा सबसे काला साया भारत का लोकतंत्र अनेक उतार-चढ़ावों से गुज़रा है, परंतु 25 जून 1975 की रात राष्ट्र ने वह क्षण देखा जिसने संविधान, नागरिक अधिकारों और सत्ता संतुलन की सबसे कठोर परीक्षा ली। इंदिरा गांधी द्वारा लगाया गया आपातकाल आज भी भारतीय राजनीति का सबसे विवादित निर्णय माना जाता है। सरकार ने इसे “आंतरिक अशांति” का प्रत्युत्तर बताया, किंतु इतिहास के गहरे पन्नों में दर्ज कारण कहीं अधिक जटिल, राजनीतिक और सत्ता-सुरक्षा से जुड़े दिखाई देते हैं। आंतरिक अशांति या सत्ता की बेचैनी? सरकार ने इमरजेंसी लगाने का कारण बताया देश में बढ़ती अशांति, अस्थिर अर्थव्यवस्था और बढ़ते आंदोलन। यह सच है कि 1973 के तेल संकट के बाद महंगाई चरम पर थी, हड़तालें बढ़ रही थीं और जेपी आंदोलन के कारण बिहार तथा अन्य राज्यों में सत्ताविरोधी माहौल बन चुका था। किंतु यह भी उतना ही सच है कि लोकतंत्र में आंदोलन अस्थिरता नहीं, बल्कि जनभावनाओं का प्राकृतिक प्रवाह होते हैं। इसीलिए इमरजेंसी का आधिकारिक तर्क जनता को कभी पूरी तरह संतुष्ट नहीं कर पाया। इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला: निर्णायक मोड़ 1...