सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

आखिर धर्म आधारित विशेषाधिकार कब तक?

 धर्म आधारित विशेषाधिकार कब तक?

UCC लागू करना ही देशहित में एकमात्र रास्ता

भारत आज भी एक ऐसे दौर में खड़ा है जहाँ कानून एक है, लेकिन उसके लागू होने के तरीके कई हैं।सबके लिए संविधान एक है, लेकिन नागरिक अधिकार धर्म के आधार पर बदल जाते हैं।यह स्थिति न समाज के लिए ठीक है और न ही देश की एकता के लिए।आज सबसे बड़ी जरूरत है धर्म आधारित हर प्रकार की छूट और विशेषाधिकार को खत्म करने कीक्योंकि जब तक कानून समान नहीं होंगे,देश में समानता, एकता और न्याय सिर्फ कागज़ पर ही रह जाएगा।

 अल्पसंख्यक आयोग क्यों हो जब देश का हर नागरिक बराबर है?यह कड़वी हकीकत है कि भारत में वोट बैंक की राजनीति ने धर्म को एक राजनीतिक हथियार बना दिया है।अल्पसंख्यक आयोग जैसे संस्थान आज धर्म विशेष के लिए बने हुए हैं,जबकि देश को चाहिए था समान अवसर आयोग सबके लिए।जब सबके अधिकार समान हैं तो फिर आयोग धर्म आधारित क्यों?

जब एक गरीब हिंदू या गरीब मुस्लिम एक ही समस्याएँ झेल रहे हैं,तो समाधान अलग-अलग क्यों?इसलिए यह आयोग अपने वर्तमान स्वरूप में अब बेमानी है।धर्म के नाम पर छूट यह विशेषाधिकार नहीं, अन्याय हैदेश में कानून सबके लिए समान होने चाहिए।लेकिन आज भी कुछ समुदायों को:शादी के अलग नियमविरासत के अलग नियम,धार्मिक संस्थानों पर अलग नियंत्रण,

और कई सामाजिक छूटें सिर्फ धर्म बदलते ही मिल जाती हैं।यह सीधे-सीधे असंवैधानिक असमानता है।धर्म की आड़ में देश को नियमों के टुकड़ों में नहीं बाँटा जा सकता।एक शादी दो बच्चे’ नियम लागू करना समय की मांग

भारत की जनसंख्या समस्या सच है, गंभीर है और बढ़ती ही जा रही है। लेकिन अफसोस, राजनीति इस मुद्दे पर भी धर्म देखती रहती है।साफ बात एक शादी दो बच्चे नियम पूरे देश में एक समान लागू होना चाहिए।

किसी धर्म को छूट मिले और किसी को न मिले यह बिल्कुल अस्वीकार्य है।देश चलाने के लिए नियम चाहिए,और नियम सबके लिए एक जैसे होने चाहिए। शिक्षा में एकरूपता मदरसे स्कूल बनें, मुल्ला नहीं शिक्षक हों

मदरसा शिक्षा के नाम पर आज भी लाखों बच्चे मुख्यधारा से कटे हुए हैं। न विज्ञान, न गणित, न नागरिक शास्त्रक्या ऐसे बच्चों का भविष्य सुरक्षित है? देश को कौशल चाहिए, ज्ञान चाहिए, रोजगार चाहिए। धार्मिक शिक्षा हर किसी का निजी अधिकार है,लेकिन स्कूलों में आधुनिक शिक्षा अनिवार्य होनी चाहिए।इसलिए मदरसों को तुरंत स्कूलों में बदला जाए,धार्मिक गुरुओं की जगह प्रशिक्षित शिक्षक नियुक्त हों, और हर बच्चे को वही शिक्षा मिले जो एक आधुनिक भारत को चाहिए। यह सुधार धर्म के खिलाफ नहीं,अज्ञान के खिलाफ है।

धार्मिक स्थलों पर समान नियम सरकार नियंत्रण करे या सबको स्वतंत्र छोड़े आज हिंदू मंदिरों की कमाई पर सरकार नियंत्रण रखती है,लेकिन कई अन्य धार्मिक संस्थान पूरी तरह स्वतंत्र हैं।यह कैसा न्याय?अगर सरकार नियंत्रण रखती है तो सभी पर हो,अगर नहीं रखती तो किसी पर न हो। यह भेदभाव खत्म होना चाहिए।UCC देश को अब और देरी बर्दाश्त नहीं Uniform Civil Code कोई नई मांग नहीं है।

यह 75 साल पुरानी उम्मीद है जिसेवोट बैंक ने रोक रखा है।यकीन मानिए जब तक शादी, तलाक, विरासत, शिक्षा और सामाजिक नियमधर्म के आधार पर अलग-अलग रहेंगे,देश में एकता सिर्फ भाषणों में ही रहेगी।UCC लागू करना अब सिर्फ एक विकल्प नहीं,राष्ट्रीय आवश्यकता बन चुका है।देश पहले, धर्म बाद मेंसाफ और सीधी बातभारत किसी एक धर्म का नहीं,140 करोड़ भारतीयों का देश है। 

कोई विशेषाधिकार नहीं,

कोई धार्मिक छूट नहीं,

कोई दोहरा कानून नहीं।

एक देश – एक कानून – एक शिक्षा – एक नियम।

इसी से भारत मजबूत बनेगा,

इसी से न्याय आएगा,

और इसी से समाज में बराबरी कायम होगी।


टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

बिहार की राजनीति में “प्रयोग” क्यों असफल हुआ? जनता ने नीयत को तवज्जो दी, अभिनय को नहीं"

"बिहार की राजनीति में “प्रयोग” क्यों असफल हुआ? जनता ने नीयत को तवज्जो दी, अभिनय को नहीं" बिहार की राजनीति हमेशा देश के लिए एक संकेतक रही है यहाँ नेता सिर्फ़ भाषणों से नहीं, बल्कि अपने चरित्र, विश्वसनीयता और  ज़मीनी जुड़ाव से पहचाने जाते हैं। हाल के चुनावों ने इस सत्य को एक बार फिर प्रमाणित कर दिया। पिछले दो वर्षों में बिहार की राजनीति में एक नया “आयातित प्रयोग” उतरा एक ऐसा नेता जो विकास मॉडल का दावा करता रहा, जिसने खुद को विकल्प के रूप में स्थापित करने की कोशिश की, लेकिन उसकी रणनीति कागज़ पर जितनी आकर्षक दिखती थी, जमीन पर उतनी ही खोखली साबित हुई। यह प्रयोग कुछ लोगों को “नई राजनीति” का प्रतीक लग सकता था, लेकिन बिहार की जनता ने इसे तुरंत समझ लिया कि नीयत और अभिनय में फर्क होता है। बड़े दावे, बड़े वादे… और बड़ी पराजय इस नए राजनीतिक प्रयोग ने चुनाव से पहले दो तेज़ हमलावर घोषणाएँ कीं  “150 सीट से कम मिली तो राजनीति छोड़ दूँगा।” “अगर जेडीयू 25 से ऊपर गई, तो सार्वजनिक जीवन से हट जाऊँगा।” इन दावों के पीछे रणनीति थी कि जनता भावनात्मक रूप से प्रभावित होकर नए विकल्प को स्वीकार कर लेगी। ...

बोरॉन की तलाश में पाकिस्तान: परमाणु सुरक्षा के लिए वैश्विक दरवाज़ों पर दस्तक

बोरॉन की तलाश में पाकिस्तान: परमाणु सुरक्षा के लिए वैश्विक दरवाज़ों पर दस्तक हाल ही में पाकिस्तान के एक परमाणु ठिकाने पर हुए मिसाइल हमले के बाद, पूरे देश में परमाणु सुरक्षा को लेकर चिंता गहरा गई है। इस संकट की घड़ी में पाकिस्तान जिस रासायनिक तत्व को सबसे अधिक खोज रहा है, वह है — बोरॉन (Boron)। परमाणु रिएक्टर में न्यूट्रॉन संतुलन बनाए रखने के लिए आवश्यक इस तत्व की आपातकालीन मांग ने पाकिस्तान को कई देशों के दरवाज़े खटखटाने पर मजबूर कर दिया है। बोरॉन क्यों है इतना जरूरी? बोरॉन एक ऐसा रासायनिक तत्व है जो न्यूट्रॉन को अवशोषित कर सकता है। परमाणु रिएक्टरों में जब न्यूट्रॉन की गतिविधि असंतुलित हो जाती है — जैसे मिसाइल हमले के बाद हुआ — तब बोरॉन डालने से रिएक्शन को धीमा किया जा सकता है और एक बड़े हादसे से बचा जा सकता है। यही वजह है कि पाकिस्तान इसे किसी भी कीमत पर जल्द से जल्द हासिल करना चाहता है। किन देशों से मांग रहा है पाकिस्तान बोरॉन? 1. चीन (China) पाकिस्तान का सबसे करीबी रणनीतिक साझेदार चीन, बोरॉन का एक बड़ा उत्पादक देश है। चीन पहले से पाकिस्तान को रक्षा, परमाणु और तकनीकी सहायता देता रहा ...

"खबर नहीं, नजरिया बेच रहा है मीडिया!"

  1. भारत का मीडिया अभी किसके साथ है? भारत में मीडिया का एक बड़ा वर्ग सरकार समर्थक रुख अपनाए हुए दिखता है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि पूरा मीडिया पक्षपाती हो गया है। भारतीय मीडिया को मोटे तौर पर तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है: (A) सरकार समर्थक मीडिया (Pro-Government Media) इस वर्ग में मुख्य रूप से बड़े टीवी चैनल, समाचार पत्र और डिजिटल पोर्टल शामिल हैं, जो सत्ताधारी दल (अभी भाजपा) के समर्थन में खुले तौर पर रिपोर्टिंग करते हैं। विशेषता: इनकी खबरों में सरकार की नीतियों की प्रशंसा अधिक दिखती है, विपक्ष को नकारात्मक रूप में पेश किया जाता है। उदाहरण: ज़ी न्यूज़, रिपब्लिक टीवी, इंडिया टीवी, एबीपी न्यूज़ जैसे चैनल अकसर भाजपा की नीतियों के पक्ष में कवरेज करते हैं। (B) विपक्ष समर्थक मीडिया (Pro-Opposition Media) यह वर्ग अल्पसंख्यक है और अधिकांश डिजिटल पोर्टल और कुछ प्रिंट मीडिया संस्थान इसमें शामिल हैं। ये सरकार की आलोचना को प्राथमिकता देते हैं। विशेषता: ये सरकार की नीतियों पर सवाल उठाते हैं और विपक्ष को ज्यादा मंच देते हैं। उदाहरण: NDTV (अब अडानी समूह के अधिग्रहण के ब...