*जब भारत सहिष्णुता का राष्ट्र है, तो वक़्फ जैसी संस्थाओं की आवश्यकता क्या है?*
भारत दुनिया का सबसे सहिष्णु, सबसे उदार और सबसे धार्मिक-सांस्कृतिक सद्भाव वाला राष्ट्र माना जाता है। लेकिन विडंबना यह है कि इसी सहिष्णु देश में कुछ संस्थाएँ ऐसी हैं जिन्हें विशेष शक्तियाँ, विशेष अधिकार और विशेष दर्जा देकर बाकी नागरिकों से ऊपर बैठा दिया गया है। सबसे बड़ा उदाहरण वक़्फ बोर्ड। वक़्फ बोर्ड: एक “सुपर पावर” जो संविधान से भी ऊपर?देश में कोई भी सरकारी विभाग, पुलिस, कलेक्टर, कोर्ट
किसी संपत्ति को अपने नाम नहीं कर सकता बिना लंबी प्रक्रियाओं, जांचों और अनुमति के। लेकिन वक़्फ बोर्ड को सिर्फ “घोषणा” करना होती है कि फला जमीन वक़्फ की है और वह जमीन उनके नाम दर्ज हो जाती है।कोई जांच नहीं, कोई सुनवाई नहीं, कोई सीमांकन नहीं।कौन सा लोकतांत्रिक देश एक ही धर्म को यह “अलौकिक अधिकार” दे सकता है?
भारत जैसा उदार राष्ट्र भी ऐसी संस्थाओं को अनुमति देता रहा यह सवाल खड़ा करता है। सहिष्णुता सबके लिए है, विशेषाधिकार किसी के लिए नहीं यदि भारत वाकई सहिष्णु राष्ट्र है
तो सहिष्णुता बहुमत अल्पसंख्यक पर आधारित नहीं हो सकती।सहिष्णुता का अर्थ है सब बराबर,सबको समान कानून,कोई संस्था संविधान से बड़ी नहीं, कोई धर्म नियमों से ऊपर नहीं। लेकिन वक़्फ बोर्ड ठीक उल्टा चलता है जहाँ एक संस्थान “देश की किसी भी संपत्ति” पर दावा कर सकता है।यह सहिष्णुता नहीं, कानूनी असंतुलन है।
मंदिर मस्जिद comparison की राजनीति से बाहर निकलकर सोचेंहिंदू मंदिरों की कमाई पर सरकार का नियंत्रण लेकिन वक़्फ की लाखों करोड़ की संपत्ति परपूर्ण स्वायत्तता? यह बराबरी नहीं। यह शासन व्यवस्था मेंधार्मिक पक्षपात है। जब मंदिरों के ट्रस्ट सरकारी निगरानी में हैं,
तो वक़्फ बोर्ड पूरी तरह मुक्त क्यों?धर्म कोई भी हो नियम एक जैसे होने चाहिए।वक़्फ का अस्तित्व भारत की एकता की भावना के खिलाफ क्यों दिखता है?क्योंकि:
यह “समान अधिकार” वाली अवधारणा को तोड़ता हैजब एक संस्था बिना जांच के जमीन अपने नाम दर्ज करा सकती है,तो वह बाकी धर्मों के प्रति अन्याय है।यह “सह-अस्तित्व” की भावना को नुकसान पहुंचाता है
जब एक समुदाय को अलग कानूनी रास्ते दिए जाते हैं,तो विभाजन गहराता है, सौहार्द नहीं बढ़ता।यह “एक राष्ट्र एक कानून” की नींव कमजोर करता हैकानून सबके लिए बराबर होना चाहिएयह किसी भी लोकतंत्र की पहली शर्त है।
भारत अगर एक उदार, आधुनिक और समानता आधारित राष्ट्र बने रहना चाहता है…तो वक़्फ जैसी संस्थाओं का पुनर्मूल्यांकन अनिवार्य हैयह धर्म का मुद्दा नहीं है,यह न्याय और समान कानून का मुद्दा है।आज देश में यह सवाल उठना वाजिब है कि—क्या किसी एक धर्म की संपत्ति का प्रबंधनसरकारी कानूनों से बाहर रहना चाहिए?क्या एक बोर्ड इतनी शक्तिशाली हो सकता है
कि वह सरकारी जमीन, रेलवे जमीन, निजी जमीन तक पर दावा कर दे? क्या यह भारत जैसे सहिष्णु और संवैधानिक राष्ट्र की भावना के अनुकूल है? जवाब साफ है नहीं।
समाप्ति: सहिष्णुता तभी सुंदर है जब न्याय में भेदभाव न हो
भारत एक ऐसा देश है जहाँ मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च—
सबके लिए सम्मान है।
लेकिन सम्मान का अर्थ यह नहीं कि
कानून धर्म आधारित हो जाए।
इसलिए, यदि भारत को एकता, समानता और न्याय के रास्ते पर आगे बढ़ना है,तो वक़्फ जैसी संस्थाएँ या तो पूरी तरह से समान कानून के दायरे में आएं,या फिर समाप्त की जाएं। एक देश एक कानून एक नियम। यही आधुनिक भारत की ज़रूरत है।
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