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इंदिरा गांधी की इमरजेंसी: लोकतंत्र पर पड़ा सबसे काला साया

इंदिरा गांधी की इमरजेंसी: लोकतंत्र पर पड़ा सबसे काला साया

भारत का लोकतंत्र अनेक उतार-चढ़ावों से गुज़रा है, परंतु 25 जून 1975 की रात राष्ट्र ने वह क्षण देखा जिसने संविधान, नागरिक अधिकारों और सत्ता संतुलन की सबसे कठोर परीक्षा ली। इंदिरा गांधी द्वारा लगाया गया आपातकाल आज भी भारतीय राजनीति का सबसे विवादित निर्णय माना जाता है। सरकार ने इसे “आंतरिक अशांति” का प्रत्युत्तर बताया, किंतु इतिहास के गहरे पन्नों में दर्ज कारण कहीं अधिक जटिल, राजनीतिक और सत्ता-सुरक्षा से जुड़े दिखाई देते हैं।

आंतरिक अशांति या सत्ता की बेचैनी?

सरकार ने इमरजेंसी लगाने का कारण बताया देश में बढ़ती अशांति, अस्थिर अर्थव्यवस्था और बढ़ते आंदोलन। यह सच है कि 1973 के तेल संकट के बाद महंगाई चरम पर थी, हड़तालें बढ़ रही थीं और जेपी आंदोलन के कारण बिहार तथा अन्य राज्यों में सत्ताविरोधी माहौल बन चुका था। किंतु यह भी उतना ही सच है कि लोकतंत्र में आंदोलन अस्थिरता नहीं, बल्कि जनभावनाओं का प्राकृतिक प्रवाह होते हैं।

इसीलिए इमरजेंसी का आधिकारिक तर्क जनता को कभी पूरी तरह संतुष्ट नहीं कर पाया।

इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला: निर्णायक मोड़

12 जून 1975 को जब इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इंदिरा गांधी को चुनावी भ्रष्टाचार का दोषी ठहराया, तो यह फैसला केवल कानूनी नहीं, बल्कि राजनीतिक भूचाल बन गया। अदालत ने न केवल उनका चुनाव अमान्य किया, बल्कि उन्हें छह वर्ष तक चुनाव न लड़ने की सज़ा भी दी। इसका सीधा अर्थ था प्रधानमंत्री पद से तुरंत इस्तीफा।

इंदिरा गांधी के सामने दो रास्ते थे 

लोकतांत्रिक परंपरा का सम्मान करते हुए पद छोड़ना,

या फिर किसी असाधारण उपाय से सत्ता में बने रहना।

उन्होंने दूसरा रास्ता चुना। और यही फैसला 25 जून की रात को देश पर अंधेरा बनकर छाया।

जेपी आंदोलन और राजनीतिक चुनौती

जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में चल रहा आंदोलन इंदिरा गांधी के लिए सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती बन चुका था। छात्र, युवा, मजदूर, मध्यवर्ग हर वर्ग में असंतोष दिखने लगा था। जेपी का “सम्पूर्ण क्रांति” का नारा एक नैतिक दबाव बना रहा था, जो इंदिरा सरकार को न केवल राजनीतिक, बल्कि वैचारिक चुनौती दे रहा था।

इमरजेंसी लागू होते ही जेपी, मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, जॉर्ज फर्नांडिस जैसे सैकड़ों विपक्षी नेता जेलों में बंद कर दिए गए।

दमन का यह चरम लोकतंत्र के नाम पर सबसे बड़ा आघात था।

संजय गांधी की सत्ता में बढ़ती दखल

इमरजेंसी केवल इंदिरा गांधी का फैसला नहीं था; यह उनके पुत्र संजय गांधी की उभरती राजनीतिक ताकत का परिणाम भी था। पार्टी और प्रशासन दोनों जगह संजय का प्रभाव असाधारण रूप से बढ़ गया था। उनका “पाँच सूत्री कार्यक्रम” नसबंदी, झुग्गी हटाओ, स्वच्छता अभियान, वृक्षारोपण व साक्षरता अभियान आंदोलन के नाम पर लागू होने लगा।

नसबंदी अभियान का दमनकारी स्वरूप और दिल्ली की तुर्कमान गेट कार्रवाई इमरजेंसी की सबसे काली घटनाओं में गिनी जाती हैं।

इसका राजनीतिक लाभ बाद में जनता पार्टी ने उठाया, और कांग्रेस पहली बार सत्ता से बाहर हुई।

प्रेस पर ताला: लोकतंत्र की सांसें बंद

इमरजेंसी का सबसे बड़ा निशाना प्रेस बनी। “The Indian Express” से लेकर “The Statesman” तक प्रमुख अखबारों के पन्ने सफेद छोड़ने पड़े क्योंकि सेंसरशिप ने स्वतंत्रता छीन ली थी।

कहा गया कि "जब प्रेस को हिलाया गया, लोकतंत्र की रूह कांप गई।"

नागरिक अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और न्यायिक स्वतन्त्रता लगभग निलंबित कर दी गई। राष्ट्र एक ऐसी खामोशी में डूब गया जिसे लोकतंत्र कभी स्वीकार नहीं कर सकता।

आर्थिक सुधार या दमन का आवरण?

इमरजेंसी के समर्थक कहते हैं कि उस अवधि में ट्रेनों की समयबद्धता सुधरी, उद्योगों में अनुशासन आया और ब्यूरोक्रेसी तेज़ हुई। लेकिन सवाल यह है क्या विकास का कोई मॉडल नागरिक अधिकारों को कुचलकर स्वीकार्य हो सकता है?

लोकतंत्र केवल अनुशासन नहीं, बल्कि नागरिक स्वतंत्रता, बहस और असहमति के अधिकार पर टिका है। इमरजेंसी विकास के बहाने लोकतांत्रिक मूल्यों का बलिदान थी।

जनता की अदालत का फैसला

जनवरी 1977 में जब इंदिरा गांधी ने चुनाव कराने का फैसला लिया, तो उन्हें शायद उम्मीद थी कि जनता उनकी “कठोर लेकिन ज़रूरी” नीति को स्वीकार करेगी। लेकिन मार्च 1977 के चुनाव परिणाम इमरजेंसी पर राष्ट्र की स्पष्ट राय थे 

कांग्रेस सत्ता से बाहर, इंदिरा गांधी और संजय गांधी दोनों अपनी सीटें हार गए।

भारत ने दिखा दिया कि लोकतंत्र को दबाया जा सकता है, खत्म नहीं किया जा सकता।

निष्कर्ष: इमरजेंसी लोकतंत्र के इतिहास का सबसे बड़ा सबक

1975 की इमरजेंसी भारतीय लोकतंत्र के लिए चेतावनी है कि सत्ता कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, जनता की आकांक्षाओं के आगे वह टिक नहीं सकती।

यह घटना हमें याद दिलाती है कि

न्यायपालिका की स्वतंत्रता,

प्रेस की आज़ादी,

और विपक्ष का मजबूत होना

लोकतांत्रिक संतुलन के लिए अनिवार्य है।

इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी को “देशहित में उठाया गया कठोर कदम” कहा था, लेकिन इतिहास ने इसे सत्ता की रक्षा में उठाया गया राजनीतिक निर्णय माना।

आज भी जब लोकतंत्र पर खतरे की चर्चा होती है, इमरजेंसी एक संदर्भ बिंदु बनकर सामने आती है एक ऐसा अतीत, जिसे किसी भी कीमत पर दोहराया नहीं जाना चाहिए। 


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