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मेडिकल क्षेत्र में कमीशनखोरी: बढ़ता जाल

 मेडिकल क्षेत्र में कमीशनखोरी: बढ़ता जाल


भारत में चिकित्सा क्षेत्र को सेवा का क्षेत्र माना जाता है, लेकिन पिछले कुछ दशकों में इसमें व्यवसायिकता और मुनाफाखोरी इस कदर हावी हो गई है कि मरीजों का भरोसा डगमगाने लगा है। डॉक्टरों, अस्पतालों, डायग्नोस्टिक सेंटरों और दवा कंपनियों के बीच कमीशनखोरी का जो जाल फैला है, उसने मरीजों को आर्थिक और मानसिक रूप से परेशान कर दिया है।


कैसे काम करता है कमीशनखोरी का सिस्टम?


1. डॉक्टरों को रेफरल कमीशन – कई अस्पताल और डायग्नोस्टिक सेंटर डॉक्टरों को हर मरीज भेजने पर कमीशन देते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि मरीजों को गैर-जरूरी टेस्ट और इलाज के लिए मजबूर किया जाता है।



2. दवा कंपनियों और डॉक्टरों की मिलीभगत – फार्मा कंपनियां डॉक्टरों को महंगे गिफ्ट, विदेश यात्राएं और अन्य सुविधाएं देकर अपनी दवाएं लिखवाने के लिए प्रेरित करती हैं, भले ही सस्ती और प्रभावी दवाएं बाजार में मौजूद हों।



3. अस्पतालों में पैकेज सिस्टम – प्राइवेट अस्पतालों में मरीजों को महंगे पैकेज के नाम पर गैर-जरूरी टेस्ट और इलाज के लिए बाध्य किया जाता है। यहां तक कि मामूली बीमारियों में भी आईसीयू में भर्ती करने की घटनाएं आम हो गई हैं।



4. डायग्नोस्टिक सेंटरों की भूमिका – लैब टेस्टिंग सेंटर डॉक्टरों को मोटा कमीशन देकर ज्यादा से ज्यादा टेस्ट कराने के लिए उकसाते हैं, चाहे मरीज को उसकी जरूरत हो या न हो।




कमीशनखोरी के दुष्प्रभाव


मरीजों पर आर्थिक बोझ – गैर-जरूरी टेस्ट और महंगी दवाओं की वजह से मरीजों का इलाज बहुत महंगा हो जाता है।


गलत और गैर-जरूरी इलाज – कमीशन के लालच में मरीजों को अनावश्यक दवाएं और टेस्ट करवाए जाते हैं, जिससे उनके स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर पड़ता है।


स्वास्थ्य सेवा पर से भरोसा घटता है – जब लोग डॉक्टरों और अस्पतालों पर भरोसा नहीं कर पाते, तो वे जरूरत पड़ने पर भी इलाज लेने से हिचकिचाने लगते हैं।


योग्य डॉक्टरों के लिए मुश्किलें – जो डॉक्टर ईमानदारी से काम करना चाहते हैं, वे इस व्यवस्था में पिछड़ जाते हैं क्योंकि वे कमीशन के खेल में शामिल नहीं होते।



समाधान क्या हो सकता है?


1. सख्त कानून और निगरानी – सरकार को मेडिकल कमीशनखोरी के खिलाफ सख्त कानून बनाने चाहिए और उनकी कड़ाई से निगरानी करनी चाहिए।



2. मरीजों की जागरूकता – लोगों को चाहिए कि वे डॉक्टर से हर टेस्ट और दवा की जरूरत के बारे में स्पष्ट सवाल पूछें।



3. जनहित याचिकाएं और मीडिया का दबाव – कोर्ट और मीडिया को ऐसे मामलों को उजागर कर सरकार पर दबाव बनाना चाहिए।



4. ईमानदार चिकित्सा व्यवस्था को बढ़ावा – मेडिकल सेक्टर में नैतिकता और ईमानदारी को बढ़ावा देने के लिए सरकार और संस्थानों को पहल करनी होगी।




निष्कर्ष


चिकित्सा एक सेवा है, लेकिन जब इसमें व्यवसायिकता और लालच हावी हो जाता है, तो मरीजों की जान और पैसा दोनों जोखिम में पड़ जाते हैं। कमीशनखोरी का यह बढ़ता जाल न सिर्फ चिकित्सा जगत को कलंकित कर रहा है, बल्कि आम लोगों के जीवन को भी प्रभावित कर रहा है। इसे रोकने के लिए सरकार, चिकित्सा संस्थान, डॉ

क्टर और आम जनता सभी को मिलकर कदम उठाने होंगे।


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