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एम. एस. गोलवलकर: आरएसएस और भारत

 एम. एस. गोलवलकर: आरएसएस और भारत


माधव सदाशिव गोलवलकर, जिन्हें "गुरुजी" के नाम से जाना जाता है, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के दूसरे सरसंघचालक थे। वे 1940 से 1973 तक इस पद पर रहे और आरएसएस की विचारधारा और संगठनात्मक संरचना को गहराई से प्रभावित किया।


गोलवलकर की विचारधारा और आरएसएस


1. हिंदुत्व की अवधारणा:

गोलवलकर ने हिंदुत्व को भारत की सांस्कृतिक और राष्ट्रीय पहचान के रूप में देखा। वे भारत को "हिंदू राष्ट्र" मानते थे और इस विचार को प्रमुखता देते थे कि हिंदू संस्कृति और मूल्य ही समाज को मार्गदर्शन प्रदान करेंगे।



2. आरएसएस में भूमिका:


संगठन का विस्तार: उनके नेतृत्व में आरएसएस का तेजी से विस्तार हुआ। उन्होंने अनुशासन, चरित्र निर्माण और जमीनी स्तर पर कार्यकर्ता तैयार करने पर जोर दिया।


शैक्षिक और सामाजिक योगदान: गोलवलकर ने शाखाओं (शारीरिक, नैतिक और वैचारिक प्रशिक्षण शिविर) के माध्यम से युवाओं में संगठन की विचारधारा को फैलाया।



3. धर्मनिरपेक्षता की आलोचना:

गोलवलकर भारत में अपनाई गई धर्मनिरपेक्षता के आलोचक थे। उन्होंने इसे भारत की सांस्कृतिक जड़ों को कमजोर करने वाला बताया। उनके विचार में भारत की एकता और अखंडता प्राचीन हिंदू परंपराओं में निहित है।


4. मुख्य रचनाएँ:


"वी, ऑर अवर नेशनहुड डिफाइंड" (1939): इस पुस्तक में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और अल्पसंख्यकों पर उनके विचार व्यक्त किए गए हैं।


"बंच ऑफ थॉट्स": यह पुस्तक आरएसएस की विचारधारा का प्रमुख स्तंभ है, जिसमें समाज, राजनीति और संस्कृति पर उनके दृष्टिकोण को संकलित किया गया है।


आजादी के बाद भारत में गोलवलकर की भूमिका


1. देश का विभाजन और सांप्रदायिकता:

गोलवलकर ने धर्म के आधार पर भारत के विभाजन का विरोध किया और कांग्रेस सरकार की अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की नीतियों की आलोचना की।



2. सरकार के साथ संबंध:


महात्मा गांधी की हत्या के बाद 1948 में आरएसएस पर प्रतिबंध लगा, क्योंकि संगठन पर नफरत फैलाने का आरोप लगा था। हालांकि बाद में आरएसएस को निर्दोष पाया गया, लेकिन इस घटना ने आरएसएस और सरकार के बीच संबंधों को तनावपूर्ण बना दिया।


गोलवलकर ने प्रतिबंध हटने के बाद संगठन की छवि को सुधारने और मजबूत करने का काम किया।



3. राष्ट्र निर्माण में योगदान:

गोलवलकर ने राष्ट्रीय रक्षा, अर्थव्यवस्था और संस्कृति को मजबूत करने के प्रयासों का समर्थन किया। उन्होंने आरएसएस कार्यकर्ताओं को राष्ट्रीय आपदाओं और युद्धों के समय सेवा देने के लिए प्रेरित किया।



गोलवलकर की विरासत


गोलवलकर भारतीय इतिहास में एक विवादास्पद लेकिन प्रभावशाली व्यक्तित्व हैं। उनके समर्थकों के लिए वे एक दूरदर्शी नेता थे जिन्होंने भारत की सांस्कृतिक पहचान को पुनर्जीवित करने के लिए काम किया। वहीं आलोचक उनकी कुछ विचारधाराओं को बहिष्कारवादी मानते हैं। उनके नेतृत्व में आरएसएस एक सशक्त सामाजिक और राजनीतिक शक्ति बना, जिसका प्रभाव भारतीय राजनीति में आज भी देखा जा सकता है, विशेष रूप से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के माध्यम से।



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