पुर्तगालियों का आगमन (1498)
पुर्तगालियों का भारत में आगमन 15वीं शताब्दी के अंत में हुआ, जो भारत के इतिहास में एक नया अध्याय लेकर आया। यह काल भारत में यूरोपीय शक्तियों के प्रवेश और उपनिवेशवाद के प्रारंभ का प्रतीक है।
1. समुद्री मार्ग की खोज
यूरोप और भारत के बीच व्यापारिक संबंध प्राचीन काल से थे, लेकिन मध्य एशिया और अरब देशों के माध्यम से यह व्यापार बहुत महंगा और लंबा हो जाता था।
15वीं शताब्दी में पुर्तगाल के राजा हेनरी ने अफ्रीका के चारों ओर समुद्री मार्ग खोजने के प्रयास तेज किए।
1497 में वास्को डी गामा ने लिस्बन से यात्रा शुरू की और अफ्रीका के दक्षिणी छोर (केप ऑफ गुड होप) को पार करते हुए भारत के लिए नया समुद्री मार्ग खोजा।
2. वास्को डी गामा का भारत आगमन (20 मई 1498)
वास्को डी गामा ने 1498 में कालीकट (कोझिकोड), केरल के बंदरगाह पर कदम रखा।
कालीकट के ज़मोरिन शासक ने वास्को डी गामा का स्वागत किया और व्यापारिक अवसर प्रदान किए।
वास्को डी गामा अपने साथ मसाले, रत्न, और अन्य व्यापारिक वस्तुओं का भंडार लेकर पुर्तगाल लौटे।
3. पुर्तगालियों का उद्देश्य
मसालों (जैसे काली मिर्च और इलायची) के व्यापार पर एकाधिकार स्थापित करना।
एशिया में ईसाई धर्म का प्रसार।
भारत में व्यापारिक और समुद्री शक्ति के रूप में खुद को स्थापित करना।
4. गोवा में पुर्तगालियों का प्रवेश
1510 में, अल्फोंसो डी अल्बुकर्क ने गोवा पर हमला किया और इसे बीजापुर के सुल्तान से छीन लिया।
गोवा पुर्तगाल का सबसे महत्वपूर्ण उपनिवेश बन गया और 450 वर्षों तक उनके नियंत्रण में रहा।
5. भारत पर पुर्तगालियों का प्रभाव
भारत में ईसाई धर्म का प्रसार।
भारतीय मसालों और समुद्री व्यापार का यूरोपीय बाजारों में विस्तार।
पुर्तगाली वास्तुकला, खानपान, और संस्कृति का स्थायी प्रभाव।
निष्कर्ष
पुर्तगालियों का आगमन भारत में यूरोपीय उपनिवेशवाद का पहला कदम था। उनका समुद्री मार्ग की खोज करना न केवल व्यापार को बदलने वाला साबित हुआ, बल्कि इसने भारतीय इतिहास पर भी गहरा प्रभाव डाला।
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